Monday, October 8, 2007

फूल

ये फूल हैं
इन्हें
अपनी टहनी पर रहने दो
यह
कुछ कहते हैं
सुनो
!
देखो,
इन्हें कहने दो


प्रेम-अवनी का
करते
व्यक्त सार
सौन्दर्य
,
विभा-
ले लहराते इनका
अव्यक्त
भार


गुनगुनाते अलियों का
गाना
सुनते
ले
मधु भार -
इतराते
लचकाते
कर
जतन, इन
दीवानों
से बचते

हे कोमलतम इनका मन
देता
परस समीर इनका तन -
पुलक बन्धन,
स्मित गुंजन
और
स्तब्ध मैं रह जाता
जैसे
हो कोई,
स्मृति की उलझन


मानव !
जग जननी की संतान, अभिषेक
क्यों
रहता कठोर, निर्दयी -
ज़रा इन् फूलों को देख
सजीव
,
निश्छल
समझ
, काँटों से भरे संसार में
तुम
दोनों का भाग्य है एक


ये फूल हैं
इन्हें अपनी टहनी पर रहने दो

यह कुछ कहते हैं, इन्हें
निहारो
चूमो

है
जीने का अधिकार,
इन्हें जीने दो

2 comments:

रंजू भाटिया said...

आपका लिख अभी पढ़ा बहुत ही अच्छा लगा
कमलेश जी आप मेरा लिखा पढ़ते हैं और पसंद करते हैं यह सुन कर बहुत अच्छा लगा कमेंट्स भी देते रहे और भी अच्छा लगेगा
बहुत बहुत शुक्रिया आपका .

Alok Shankar said...

:) ye achcha wala hai.