ह्रदय की तुलिका को प्रेम रस में डुबा-डुबाकर - लिखी वे अमर पंक्तियां नसों को ज़रा कसते-कसते ।
मन की कोरी कल्पना क्षण प्रकट क्षण अदृश्य - बन अतृप्त अभिलाषा करती आघात हँसते हँसते ।
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