रेत में गढे निशान जाने ढूंढें कौन मंज़िल ? कुछ राही गुजरे होंगे लेकर साँसें बोझिल ।
इस मरुस्थल की व्यथा तो देखो न बनती इस पर कोई कहानी -पद-पद बने शब्दाचिंह , चुपके से समीर कर देता आंखों से ओझल ।
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