ये फूल हैं
इन्हें अपनी टहनी पर रहने दो ।
यह कुछ कहते हैं
सुनो !
देखो,
इन्हें कहने दो ।
प्रेम-अवनी का
करते व्यक्त सार ।
सौन्दर्य,
विभा-
ले लहराते इनका
अव्यक्त भार ।
गुनगुनाते अलियों का
गाना सुनते ।
ले मधु भार -
इतराते
लचकाते
कर जतन, इन
दीवानों से बचते ।
हे कोमलतम इनका मन
देता परस समीर इनका तन -
पुलक बन्धन,
स्मित गुंजन ।
और स्तब्ध मैं रह जाता
जैसे हो कोई,
स्मृति की उलझन ।
ए मानव !
जग जननी की संतान, अभिषेक ।
क्यों रहता कठोर, निर्दयी -
ज़रा इन् फूलों को देख
सजीव,
निश्छल ।
समझ, काँटों से भरे संसार में
तुम दोनों का भाग्य है एक ।
ये फूल हैं
इन्हें अपनी टहनी पर रहने दो
यह कुछ कहते हैं, इन्हें
निहारो
चूमो ।
है जीने का अधिकार,
इन्हें जीने दो ।