Monday, October 8, 2007

फूल

ये फूल हैं
इन्हें
अपनी टहनी पर रहने दो
यह
कुछ कहते हैं
सुनो
!
देखो,
इन्हें कहने दो


प्रेम-अवनी का
करते
व्यक्त सार
सौन्दर्य
,
विभा-
ले लहराते इनका
अव्यक्त
भार


गुनगुनाते अलियों का
गाना
सुनते
ले
मधु भार -
इतराते
लचकाते
कर
जतन, इन
दीवानों
से बचते

हे कोमलतम इनका मन
देता
परस समीर इनका तन -
पुलक बन्धन,
स्मित गुंजन
और
स्तब्ध मैं रह जाता
जैसे
हो कोई,
स्मृति की उलझन


मानव !
जग जननी की संतान, अभिषेक
क्यों
रहता कठोर, निर्दयी -
ज़रा इन् फूलों को देख
सजीव
,
निश्छल
समझ
, काँटों से भरे संसार में
तुम
दोनों का भाग्य है एक


ये फूल हैं
इन्हें अपनी टहनी पर रहने दो

यह कुछ कहते हैं, इन्हें
निहारो
चूमो

है
जीने का अधिकार,
इन्हें जीने दो

पथ की नीरवता
पथिक की विषमताएँ
दोनों की ही विवशता
सामंजस्य कैसे बैठाएँ ?

एक असंख्य्क रहस्यों का ज्ञाता
दूसरे में भरी अनेक अभिलाषाएँ
एक ही ओर जाते दोनों
फिर भी, पृथक कितनी दिशाएँ

टूट गयी हैं शब्दावलियाँ
शिराओं की गाथाएं भी मूक हैं
मौन धरे इस ह्रदय में
व्यथाएं अनेक, राग सिर्फ एक है

जग जननी का नैराश्य,
पथ में काँटों का बिखरना
बेसुध पथिक का भाग्य ,
पग में उसका चुभ जाना

चपल पल की जिज्ञासा
ठहर , अनूठा दृश्य यह देख जाना
आँसू टपका गया वह वैरागी
करुणा के बीज का अंकुर बन आना

ह्रदय की तुलिका को
प्रेम रस में डुबा-डुबाकर -
लिखी वे अमर पंक्तियां
नसों को ज़रा कसते-कसते

मन की कोरी कल्पना
क्षण प्रकट क्षण अदृश्य -
बन अतृप्त अभिलाषा
करती आघात हँसते हँसते

सागर की लहरों का चिर प्रयास -
आलिंगन विधु से, शुन्य में मिल
असंभव की असफलता पर बनता क्षार -
सघन क्षुब्ध्ता, बनकर चल फेनिल

रेत में गढे निशान
जाने ढूंढें कौन मंज़िल ?
कुछ राही गुजरे होंगे
लेकर साँसें बोझिल

इस मरुस्थल की व्यथा तो देखो
बनती इस पर कोई कहानी -
पद-पद बने शब्दाचिंह , चुपके से
समीर कर देता आंखों से ओझल

Friday, August 10, 2007

दिल्ली के स्टेशन पर एक दिन....

मुझे कैसी प्रेमिका चाहिऐ ? यह प्रश्न जितना सटीक है उतना ही कठिन भी वैसे तो दिल हर दूसरी लडकी के लिए फिसलता है, जो दो बातें हँस के करले उसी के संग हो लेता है मन की इस चंचल तरलता के सामने बड़ा विवश रहता हूँ, कुछ परेशान सा रहता हूँ पर यह रंग जितना जल्दी चढ़ता है उतना ही तेज उड़ भी जता है ऐसा अधिकांश समय होता है मैं फिर विस्मृति में खो जता हूँ और मन-आहेर किसी शिकार की तलाश में निकल पड़ता है चहरे पर मधुर मुस्कान और फिर बुझासा उसका अतिक्रमण ; यह क्रम तो चलता ही रहता है पर कुछ चहरे ऐसे दिख जाते हैं जिनको देखते ही एक झंकार गूँज उठती है मन में , जिसकी प्रतिध्वनि हृदयांचल से टकराती रहती है मय में डूबी मधु स्मृति आकस्मिक क्षणों में आकर पुलकित सा कर जाती है ऐसी ही एक घटना ( मेरे लिए शायद दुर्घटना ) और उसकी नायिका को प्रभाषित करने का लघु प्रयास इस लेख में प्रतिबिंबित है
मेरी बहिन के यहाँ जैपुर में रहने का निर्धारित समय पूरा होने को रह था दोपहर को दिल्ली के लिए निकलना था जीजाजी ने साले के लिए .सी बस की टिकटें भी करवा दी थी वे प्राय लोगों को लेने से ज़्यादा छोड़ते वक़्त खुश होते हैं कारण स्वाभाविक है, और मुझे बुस स्टैंड पर छोड़ते वक़्त उनके चहरे पर छाई मुस्कान उसका प्रमाण भी दे रही थी बस में ए.सी था सो, जुकाम तो लगना ही था लग गया
दिल्ली वाले बस स्टैंड पर पहुँचा गाड़ी निकलने में अभी दो घंटे बाकी थे, पर वहां क्या करता यह सोच कर स्टेशन के लिए आटो पकडा दिल्ली के स्टेशन के सामने वाली गलियों में जो खाना मिलता है , आह ! इस विषय पर तो एक स्वादिष्ट लेख लिख सकता हूँ, पर अभी नहीं वहां पर पीयी हुई मलाईदार लस्सी अभी भी याद है खा-पीकर बस स्टेशन में घूस गया
भीड़ में से गुज़रते हुए अपना सामान लेकर प्लेटफार्म पर भी पहूंच गया एक घंटा और बाकी था , गाडी भी लगी थी बस में : घंटे का सफ़र और भर-पेट खाना ( लस्सी भी ), दोनों ही से शारीर थका हुआ था और उसपर लगा लोगों का मेला ! झल्लाहट और पसीना - दोनों ही से ग्रस्त था भीड़ में कुर्सी पर बैठने की अपेक्षा करना मूर्खता ही होगी सो यह जान में अपने सामान पर ही विराजमान हुआ बैठे- बैठे लोगों को देखने में भी कुछ विशेष मज़ा नहीं रहा था सिटुएशन ही कुछ ऐसी थी कि दिमाग भी हड़ताल पर चला गया
कई बार ऐसा होता है की किसी फूलों के बाग़ में भीतर जाने के पूर्व ही हमें उनसे आती खुशबू ही मंत्रमुग्द कर देती है , तट पार आने वाले स्वर्ण साम्राज्य की आभा सूर्य रश्मियां का बिखर कर देती है या फिर, मेघ आवृत रात में विधु का हल्के-हल्के सामने आना मानों घूंघट के पीछे छुपी सुन्दरता का प्रतीत होना ऐसी ही किसी होनी का वातावरण में फैले कण - कण संकेत दे रहे थे एक मीठी सी सिहरन दौड़ चली
इस वक़्त में मेरे प्लेटफार्म पर टहल रह था तभी एक लडकी को देखा समय का स्तब्द होना जो अन्य लोग बतलाते थे आज उसका एहसास किया पल भार के लिए मन छटपटा उठा इतनी सुन्दरता देखकर जब होश आया तो स्वयं को फिर उस मधु जाल में डूबा पाया अंग-अंग मानो भव रस में डुबा कर तराशा गया हो रंग पीला पड़ता हुआ सफ़ेद और उसके उपर सफ़ेद कपडों का आवरण दीप-शिखा सी होकर भी असीम शीतलता का आभास देती वह मेरे मन में रह-रह कर एक प्यास जगा रही थी कोई श्रृंगार नहीं था, सादगी ही मोहित किये जा रही थी
कुछ समय पश्चात् मैंने अपने आप को विरल पंक्तियाँ रचते पाया उसका विवरण शब्दातीत है यह भी जल्द ही पता चल गया मेरे ह्रदय की व्यथा को शब्दों में पिरोने में भी मैं असमर्थ रहा जीवन में ऐसे क्षण बहुत कम आतें हैं जब, हम इतना कहना चाहते हैं पर शब्दों पर अंकुश पाते हैं इसीलिये मेरे अन्दर उसकी स्मृति में अब कोई शब्द नहीं सिर्फ कुछ रंगे जुए चित्र हैं उसका चेहरा , वह आँखें और निश्छल तन अब भी अच्छी तरह याद है
थकान के कुछ चिन्ह उसके चहरे पर अंकित थे ज़रा सी झुकी हुई आँखें शर्म का भव ज़्यादा और थकान का कम दे रही थी कम से कम मेरे नयनों में इसी सुन्दरता को देखा समीर उसके तन को छूकर शूल समान लग कर असंख्यक स्पंदन दे रह था दुनिया के नियम भंगित कर मेरी आँखें उसी पर टिकी थी सोचा की जीं भार के देख लूं , जाने यह मधुक्षण कब बीत जाये , ज़रा स्मृति पट पर उसे गहरे से अंकित कर हमेशा के लिए क़ैद करलूँ
जब ऐसे ही ख्यालों में खोया तो अचानक पाया की वह जा रही है शायद उसका डब्बा कोई और होगा मैं वहीँ का वहीँ खड़ा उसे जाते देखता रहा उसे जाते देख पता चला की उसके साथ एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति भी है, वस्तुत: वह उसका पिता था उसके होने पर शायद में उस लडकी से बात करने का सहस कर लेता खुद से विद्रोह की चाहत में शायद नहीं भी गाड़ी आने में अभी भी काफी वक़्त था मैंने अपना सामान उठाया और उसे ( कुछ से काफी ) देखने की चाहत में चल पड़ा पूरे प्लेटफार्म का सफ़र तय किया फिर भी जिस फूल की तलाश थी, नहीं मिला निराश मन और रुके-रुके क़दमों से जब वापस लौट रहा था तब, वह नज़र आयी चिर काल से खोई कोई चीज़ जब अनायास ही मिल जाती है tab जितना संतोष मन पता है, वैसी ही तृप्ति का अनुभव कर रह था उसे देखने के लिए जितना करीब जाता ह्रदय की गति और बढ जाती डर लगता के कहीँ वह मेरी इन धड़कनों को सुन ले, और सुनकर अगर मुस्कुरा दे तो मेरे शर्म से पानी- होने की पूरी सम्भावना थी
कहतें हैं की प्यास की पूर्ती ही उससे मिले सुख का नाश करती है इसी प्यास से मेरे मन में अब तक मन्द-मन्द वेदना तपती रही इस दर्द से मिले आनंद का मज़ा ही कुछ और होता है मेरा मन निरंतर द्वंद में फस गया एक मन मिलने के लिए तड़पता दूसरा इसी तड़प को अमर बनाने के लिए पहले का अतिक्रमण करता मैं उसका नाम जान सकता हूँ , सफ़र में मौका देख कर उससे दो बातें कर सकता हूँ - परिचय ले सकता हूँ - दे सकता हूँ इत्यादी ; नहीं करने का प्रण लिया उसके अस्तित्त्व को इस अतिक्रमण से, मेरे मन में(ने) एक विशेष अभिप्राय दिया
अब तक गाड़ी चुकी थी और वह अपने पिता के साथ चढ़ने के लिए तैयार थी पता नहीं उसने मुझे देखा भी या नहीं ; यह सोचकर अपने अकिंचन मन - अस्तित्त्व पर हंसी सी आगयी गाड़ी कुछ देर में चल दी सफ़र उसके उसी गाड़ी में होने के बावजूद अकेले ही काटना था फिर भी, साथ अमृता प्रीतम की 'पिंजर' ने दिया कुछ खास लगी, कुछ रास आया बस पन्नों को पलटते - पलटते कभी-कभी उसकी स्मृति किसी और लोक में ले जाती और उसके बाद ; फिर वही कहानी की वास्तविकता और रेलगाडी के झूले