उठती लहर - चूमती शिखर
करे प्रश्न, मेरा अस्तित्व है किधर ?
चल समीर के प्राण लेकर
जीती समर, हुआ वेग प्रखर
फ़िर हुआ मगर, गया अहसास आखर -
गरज नहीं, है बोध इतना
कि क्षण को बाँध लूँ - बल उतना
स्व से हारी, देख अभिमान जितना
हाय ! अब गिरी मैं बूँद बूँद होकर -
कुछ इधर, कुछ उधर ।
Saturday, March 7, 2009
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