उठती लहर - चूमती शिखर
करे प्रश्न, मेरा अस्तित्व है किधर ?
चल समीर के प्राण लेकर
जीती समर, हुआ वेग प्रखर
फ़िर हुआ मगर, गया अहसास आखर -
गरज नहीं, है बोध इतना
कि क्षण को बाँध लूँ - बल उतना
स्व से हारी, देख अभिमान जितना
हाय ! अब गिरी मैं बूँद बूँद होकर -
कुछ इधर, कुछ उधर ।
Saturday, March 7, 2009
Thursday, March 5, 2009
क्षणिकाएँ
है वोह दामिनी या,
कोमल कलि की सिहरन ?
प्रणय - निवेदन कैसे करुँ
क्षण-भंगुर दोनों का जीवन ।
…………………………………………
पथ को तकती अबला बैठी
गाती मिलन -विरह के गान ।
मैं पथिक अकिंचन मन लिए -
शुन्य की ओर करता प्रस्थान ।
…………………………………………
इन अश्कों का गुमान तो देखो ,
घिरता दर्द, जाती बहार तो देखो ।
गिर पड़ते ये अनमन, इनके कण-कण में,
बसी एक व्यथा, बेज़ुबन खुमार तो देखो ।
…………………………………………
खुले नयन से सपने देखो
बंद नयन से अपने ,
अपने तो रहतें हैं भीतर
बाहर रहते सपने ।
खड़ा अकेला मध्य समर में,
अपने अद्रष्टों के द्वार ।
अंतर्ध्वनि पूछे नाद बन,
जाना है किस पार ।
कोमल कलि की सिहरन ?
प्रणय - निवेदन कैसे करुँ
क्षण-भंगुर दोनों का जीवन ।
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गाती मिलन -विरह के गान ।
मैं पथिक अकिंचन मन लिए -
शुन्य की ओर करता प्रस्थान ।
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इन अश्कों का गुमान तो देखो ,
घिरता दर्द, जाती बहार तो देखो ।
गिर पड़ते ये अनमन, इनके कण-कण में,
बसी एक व्यथा, बेज़ुबन खुमार तो देखो ।
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बंद नयन से अपने ,
अपने तो रहतें हैं भीतर
बाहर रहते सपने ।
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अपने अद्रष्टों के द्वार ।
अंतर्ध्वनि पूछे नाद बन,
जाना है किस पार ।
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