Saturday, March 7, 2009

उठती लहर

उठती लहर - चूमती शिखर
करे प्रश्न, मेरा अस्तित्व है किधर ?

चल समीर के प्राण लेकर
जीती समर, हुआ वेग प्रखर
फ़िर हुआ मगर, गया अहसास आखर -
गरज नहीं, है बोध इतना
कि क्षण को बाँध लूँ - बल उतना
स्व से हारी, देख अभिमान जितना

हाय ! अब गिरी मैं बूँद बूँद होकर -
कुछ इधर, कुछ उधर ।

Thursday, March 5, 2009

क्षणिकाएँ

है वोह दामिनी या,
कोमल कलि की सिहरन ?
प्रणय - निवेदन कैसे करुँ
क्षण-भंगुर दोनों का जीवन ।

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पथ को तकती अबला बैठी
गाती मिलन -विरह के गान ।
मैं पथिक अकिंचन मन लिए -
शुन्य की ओर करता प्रस्थान ।

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इन अश्कों का गुमान तो देखो ,
घिरता दर्दजाती बहार तो देखो ।
गिर पड़ते ये अनमनइनके कण-कण में,
बसी एक व्यथाबेज़ुबन खुमार तो देखो ।

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खुले नयन से सपने देखो
बंद नयन से अपने ,
अपने तो रहतें हैं भीतर
बाहर रहते सपने ।

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खड़ा अकेला मध्य समर में,
अपने अद्रष्टों के द्वार ।
अंतर्ध्वनि पूछे नाद बन,
जाना है किस पार ।