Sunday, August 5, 2007

क्षणिकायें - II

तीखी नोक, तीखे विचार
हो सक्षम रचयिता
तो बदले युग की धार ।

प्रबल नदी, तेज पतवार
दृढ नाविक -
अपना पथ अपनी धार ।

टूटी तुलिका, रुके-रुके से विचार
कहॉ गया मुखरित संकल्प
और प्राणों का भार ?

बिखरी रेखाएँ, झूठे चित्रकार
ढूंढें कौन पथ-
खोया बीच मझधार ?

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प्रात: प्रथम रश्मि आती
बन मंजुल प्रणय-निवेदन ।
आवृत्त इंकार धरती का
चिर सुलगित दिनकर का मन ।

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जीवन समर का चित्र निराला ।
उल्लेख परे; है चरित्र न्यारा ।
पग-पग संघर्ष, फिर भी -
अदृष्ट प्रतिद्वंदी; है अनचखी हाला ।

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पल पल ' मैं ' को माया बंदी पता,
विचित्र बन्धन -
कैसा यह अनुराग है ?
बस चलते-चलते मैं उड़ना भूला,
विधि का लेख या -
कोई मेरा अभिशाप है ?

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सागर की लहरों का चिर प्रयास -
आलिंगन विधु से, शुन्य में मिल ।
असंभव की असफलता पर बनता क्षार -
सघन क्षुब्ध्ता, बनकर चल फेनिल ।

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चितेरे का यह जड़ नूतन
भरे उजाले में फैला (दिखता) घन तम ।
जो परोक्ष था कभी, जिसपर आवरण
अब प्रत्यक्ष , बना चित्र चेतन ।

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