Tuesday, July 17, 2007

क्षणिकाएं I

अक्षत समुद्र तट पर, प्रचंड लहरों का टकराना ।
मेरे कोमल हृदय पे उनका पत्थर फेंका जाना ।।
लौटती लहरों का ‘फिर प्रहार’ ; दृढ करना ।
आहत मेरे हृदय को , उनका आँसू टपकाकर जाना ।।
………………

क्यूँ होते क्षुब्द सितार पर ,
कहते कर्कश कुपित स्वर ।
निशाब्द संगीत निनाद समर ,
न साधे हरकोई नर ।।
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डर लगता है खो न जाए,
मुक्ता संग संगीत ।
विरह अनल में सूखे अश्रु ,
निसंग हर स्वर गीत ।।
…………………
अतृप्त वसुधा ,
नीरद नीर रीते ।
संक्षिप्त व्यथा ,
पीर शेष ना बीते ।।
…………………
रुधिर रंजित है हृदय,
फैला अरुण नभ असहाय ।
देख दग्ध क्षोणि का महामरण,
अश्रु पुंज भी सूख जाय ।।
…………………
विकीर्ण प्रकाश सागर में,
विप्रलब्ध रश्मि एक मतवाली।
मेरे विरंजित ह्रदय में,
ढूंढे प्राणों की होली ।
………………
विस्तृत विस्मृति सागर में ,
प्रेम सखा संग मेरे चल ।
साध यही विलय तुझमें हो जाऊं,
मिटे मेरा अस्तित्त्व पल-पल ।
……………
प्रपंच विषम ,
गूढ़ प्रण मानव का एक ।
क्षण - क्षण प्रयास,
बदलने विधि का लेख।।
………………..

नित्य कातर श्वासों का
क्रम जब टूटेगा ।
चिर बन्धन से मुक्त आत्मा का प्रथम
स्पंदन तब मिलेगा ।।
………………

देख अवनी का नभ से वारित अभिसार,
जाने क्यों हो जता ह्रदय का
छिन्न तार तार ।
है मध्य शुन्य ही दोनों के ,
फिर भी कूल दो और समुद्र अपार ।
..................
ह्रदय में फैली कालिमा का बन यामिनी
आँखों में यूँ उतरना ।
इस घन तम में स्वप्न रंजित तारों का
पुलकित हो चमकना ।
बीतते पहरों में क्षणभंगुर बन
समय का खो जाना ।
प्रात: कुसुम सज्जित शयन पट का फिर
क्षण - रेत हो बह जाना ।
..........................
ले चिरंतन बन्धन का भार किन्तु
विस्मृति का वरदान ; नव जीवन का आना ।
मुक्त मुकुल में बंदी सौरभ का
मृदु पीर बन कुछ सिमट सा जाना ।
स्वतंत्र होती हरेक पंखुडी का
गहरा उछ्वास ले कुसुम प्रस्तुत होना ।
महकते मुस्काते चिर विश्व में
कदम कदम समीर संग बहकते जाना ।
फिर एक-एक पंखुडी का गिर-गिर कर
अस्तित्त्व खो स्मृति बन जाना ।
जलती बुझती इस लय (लौ) का जाने ,
कब अंत होगा अंजाना ?
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1 comment:

Alok Shankar said...

तत्सम शब्दों के बीच " हृदय पे उनका " अटपटा लगता है । "हिय पर उनका " होता तो लय भी बनी रहती और प्रवाह भी सही रहता ।

क्षुब्द- क्षुब्ध
निशाब्द- निःशब्द
निसंग - निःसंग

अतृप्त वसुधा ,
नीरद नीर रीते ।
संक्षिप्त व्यथा ,
पीर शेष ना बीते ।।- बहुत सुंदर है । "ना " की जगह "न" भी चलता ।

"प्रपंच विषम ,
गूढ़ प्रण मानव का एक ।
क्षण - क्षण प्रयास,
बदलने विधि का लेख।।" भी बहुत अच्छा है

देख अवनी का नभ से वारित अभिसार,
जाने क्यों हो जता ह्रदय का
छिन्न तार तार ।
है मध्य शुन्य ही दोनों के ,
फिर भी कूल दो और समुद्र अपार । : इनको अत्यन्त ही सुन्दर छन्द प्रवाह में बाँधा जा सकता था । इस प्रकार उन पंक्तियों का ओज बढ़ता ।

स्वतंत्र होती हरेक पंखुडी का : यह पंक्ति अंतिम वाली में खटकती है । खासकर "हरेक " शब्द इसकी जघ "हर एक " ज्यादा प्रभावी और सुन्दर होता ।


आपकी कविताओं का स्तर बहुत अच्छा है । निराला जी वाला स्टाइल है। बस अगर एक पंक्ति में चार गंभीर शब्द हो तो उनको प्रवाह में भी लिखा जा सकता है ।
"निशाब्द संगीत निनाद समर , " में चारों शब्द अलग थलग दिखते हैं पर ऊपर की ही पंक्ति में देखें तो उसी तरह ही पंक्ति
"कहते कर्कश कुपित स्वर ।"
ज्यादा सुन्दर लगता है । क्यों? क्योंकि "कहते" शब्द उसे पिछली पंक्ति से कनेक्ट करता है । अगर इस तरह का प्रेजेन्टेशन हो तो कविता बहुत प्रभावी होगी । शब्द भंडार और कविता की उत्कृष्ट शैली तो आपके पास है ही ।
सस्नेह
आलोक