Friday, July 20, 2007

कलकत्ता की गलियों में एक दिन

कई बार ऐसी स्थिति आ जाती है जिसमे जिज्ञासा और भय जैसे द्वंदात्मक भाव विचित्र रुप से उत्पन्न हो जाते हैं । मन में पल-पल बढती लालसा और उर में भय को संचित करती है मधुर-मधुर सिहरन । ऐसे विरोधात्मक समय में चहरे की स्मित रेखा और सिकुड्ती भौंहें मानो मिश्रित भावों का प्रत्यक्ष प्रमाण देती हों । कुछ ऐसे ही वाकिये का लघु वर्णन करने जा रहा हूँ ।
आड़ी-तिरछी गलियाँ मानो अपने प्रत्यक्ष रुप में कितने ही रहस्यमय परोक्ष की ओर संकेत करती हैं । मेरी आँखें इन पुरानी इमारतों में और बंगाली लोगों के मुख भावों में कुछ ढूंढ रही थी। मेरे साथ मेरा चचेरा भाई था जो, इन् गलियों का आदि था, अभ्यस्त था।
नारी के विभिन्न रूपों से बने समीकरण, नर में हर प्रकार के भावों को उत्पन्न करने में सक्षम होतें हैं। और ज़रा चिन्तन किया जाये तो प्रतीत होगा कि, नर के जीवन का भव पक्षीय व्यापन अधिकतम नारी के साथ ही होता है। उन में से एक रुप है वैश्या का। आत्मदाह कर अंगों का यह व्यापर बड़ा विचित्र है। कुछों के लिए जिज्ञासा का विषय और कुछ लोगों के लिए काम तृप्ति का सस्ता साधन। और कुछ मेरे जैसे हौं जो उनकी आंखों में झांक कर दिल में उतरने की अपूर्ण प्यास लिए घुमते हैं। विरंजित मॅन पर रंगा हर अंग ; आकर्षण और विकर्षण का अजीब समन्वय बनाते hain। एक पतली सी गली में दोनों तरफ रंगों कि ऐसी ही हाट लगी थी । औरतें 'ग्राहकों' को आकर्षित करने शारीरिक इन्गितियों का भरपूर प्रयोग कर रही थीं । कोई खुले केश संवारती तो कोई अपने वक्ष कि गरमी का एहसास देने को आतुर । कोई मन्द-मन्द मुस्काती तो कोई शर्माकर आँखें झुकाती। मेरे मॅन में काव्य रस का बोध व कुछ विरल पंक्तियों की उत्पत्ति अनायास ही हो रही थी। मन में एक द्वंद था; कुछ जानने की इच्छा और उसके पूर्ण होने का भय । नहीं; यह किसी शाश्वत परिरंभ या काम-सुख का स्वाद चखने वाली आशा-जिज्ञासा न थी। आशा उस गली में चलते रहने की थी। जिस प्रकार नन्हा बालक खिलौनों की दुकान में , हर एक खिलौने को टंटोल-टंटोल कर देखना चाहता है, उसी तरह मुझे हर एक को देखने की चाह थी और उसकी पूर्ती भी कर रहा था। इसे निरीक्षण की उक्ति देना भी अनुचित न होगा। उनके प्रदर्शित वक्ष-स्थल के भीतर कातर उर में झांकना चाहता था ।
क्या अर्थ का आभाव ही ऐसे निंद्य व्यवसाय का मौलिक कारण है ? यह प्रश्न रह-रह कर मन में आता रहा। क्या अर्थ का अभाव दृस्टिकोणों में इतना अंतर ला सकता है कि, एक तरफ तो समस्त संसार घृणत्मक नज़रों से देखे और दूसरी तरफ ये काम इन वैश्यों में स्वाभाविकता का रुप ले ले ? हमारी असाधारण प्रवर्त्ति उनका साधारण व्यहवार ।
इसी तरह इन गलियों में चलते-चलते इन्हें देखते-देखते उनके निर्बाध आमंत्रणों
को नकारते हुए कई विचार आते रहे। अचानक उनके घर के खुले दरवाज़ों में से झांकते हुए बच्चों को देखकर एक आतंकित कर देनेवाला ख़्याल आया। यह कौन हैं ? इनका अस्तित्त्व क्या है ? संसार तो इन्हें असीम सुख के मध्यस्थ बोए पाप के बीजों की उत्पत्ति ही समझता है . पर क्या इन वैश्यों को प्रसव के सुख का अधिकार नहीं ? और अगर है तो नीति कुछ और क्यों कहती है और नियति में भी इतना खरापन क्यों ? समाज में असंख्यक नियम हैं, कई ज़रूरी हैं और कई बनावटी, निरर्थक और मूल्यहीन मतों से संचालित । ये बच्चे जब बडे होकर अपनी वैश्य माताओं से प्रश्न करेंगे की ' आख़िर क्यों ? '; यह सोचकर ही मन विह्वल उठा । इस तरह विचारों की कडियाँ बनती चली और गली खत्म होने को आयी । कुछ मिनटों बाद जीवन फिर सामान्य स्तर व गति पर आगया। पर अक्सर आज भी कुछ चहरे स्मृति पट पर चलचित्र के समान आकर ज़रा ठहरकर फिर तम में विलुप्त हो जाते हैं. मेरा मन फिर से जिज्ञासा और भय से भर जता है और दिमाग लग जाता है कुछ सोचने ।

Tuesday, July 17, 2007

क्षणिकाएं I

अक्षत समुद्र तट पर, प्रचंड लहरों का टकराना ।
मेरे कोमल हृदय पे उनका पत्थर फेंका जाना ।।
लौटती लहरों का ‘फिर प्रहार’ ; दृढ करना ।
आहत मेरे हृदय को , उनका आँसू टपकाकर जाना ।।
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क्यूँ होते क्षुब्द सितार पर ,
कहते कर्कश कुपित स्वर ।
निशाब्द संगीत निनाद समर ,
न साधे हरकोई नर ।।
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डर लगता है खो न जाए,
मुक्ता संग संगीत ।
विरह अनल में सूखे अश्रु ,
निसंग हर स्वर गीत ।।
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अतृप्त वसुधा ,
नीरद नीर रीते ।
संक्षिप्त व्यथा ,
पीर शेष ना बीते ।।
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रुधिर रंजित है हृदय,
फैला अरुण नभ असहाय ।
देख दग्ध क्षोणि का महामरण,
अश्रु पुंज भी सूख जाय ।।
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विकीर्ण प्रकाश सागर में,
विप्रलब्ध रश्मि एक मतवाली।
मेरे विरंजित ह्रदय में,
ढूंढे प्राणों की होली ।
………………
विस्तृत विस्मृति सागर में ,
प्रेम सखा संग मेरे चल ।
साध यही विलय तुझमें हो जाऊं,
मिटे मेरा अस्तित्त्व पल-पल ।
……………
प्रपंच विषम ,
गूढ़ प्रण मानव का एक ।
क्षण - क्षण प्रयास,
बदलने विधि का लेख।।
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नित्य कातर श्वासों का
क्रम जब टूटेगा ।
चिर बन्धन से मुक्त आत्मा का प्रथम
स्पंदन तब मिलेगा ।।
………………

देख अवनी का नभ से वारित अभिसार,
जाने क्यों हो जता ह्रदय का
छिन्न तार तार ।
है मध्य शुन्य ही दोनों के ,
फिर भी कूल दो और समुद्र अपार ।
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ह्रदय में फैली कालिमा का बन यामिनी
आँखों में यूँ उतरना ।
इस घन तम में स्वप्न रंजित तारों का
पुलकित हो चमकना ।
बीतते पहरों में क्षणभंगुर बन
समय का खो जाना ।
प्रात: कुसुम सज्जित शयन पट का फिर
क्षण - रेत हो बह जाना ।
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ले चिरंतन बन्धन का भार किन्तु
विस्मृति का वरदान ; नव जीवन का आना ।
मुक्त मुकुल में बंदी सौरभ का
मृदु पीर बन कुछ सिमट सा जाना ।
स्वतंत्र होती हरेक पंखुडी का
गहरा उछ्वास ले कुसुम प्रस्तुत होना ।
महकते मुस्काते चिर विश्व में
कदम कदम समीर संग बहकते जाना ।
फिर एक-एक पंखुडी का गिर-गिर कर
अस्तित्त्व खो स्मृति बन जाना ।
जलती बुझती इस लय (लौ) का जाने ,
कब अंत होगा अंजाना ?
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